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Friday, September 21, 2012
Najar dosha नजर उतारने के उपाय
Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666
Tuesday, September 18, 2012
Sankat Mochan Dwadas Naama strotra
संकटनाशनं श्री गणेशस्तोत्रम्
॥श्री गणेशाय नम:॥
॥नारद उवाच॥
Sankata Nasana Ganesh Stotra
ll Shri Ganeshay Namah ll
ll Narada uvaca ll
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् l
भक्तावासं स्मरेन्नित्यामायु: कामार्थ सिध्ध्ये ॥
Pranamya sirasa devan gauriputram vinayakam l
bhaktavasam smaren nityam ayus kamartha siddhaye ll
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् l
तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवकत्रं चतुर्थकम् ॥
Prathamam vakratundam ca ekadantam dvitiyakam l
trtiyam Krsna pingaksam gajavaktram caturthakam ll
लंबोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च l
सप्तमं विन्धराजं च धूम्रवर्ण तथाSष्टमम्।l
नवमम् भालचन्द्रम् दशमं तु विनायकम् l
ऐकादशं गणपति द्वादशं तु गजाननम् ॥
Lambodaram pancamam ca sastam vikatam eva ca l
saptamam vighnarajam ca dhumravarnam tathastamam ll
Navamam phalacandram ca dasamam tu vinayakam l
ekadasam ganapatim dvadasam tu gajananam ll
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर: l
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ॥
Dvadasaitani namani trisandhyam yah pathen narah l
na ca vighnabhayam tasya sarvasiddhi karam param ll
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् l
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥
Vidyarthi labhate vidyam dhanarthi labhate dhanam l
putrarthi labhate putran moksarthi Labhathe Gatheem ll
जपेद्द गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलम् लभते l
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय ॥
Japet Ganapati stotram sadbhir masaih phalam labhet l
samvatsarena siddhim ca labhate natra samsayah ll
अष्टानां ब्राह्मणानां च लिखित्वा य: समर्पयेत् l
तस्यविद्या भवेत्सर्वा गणेशस्यप्रसादत॥
॥ इतिश्री नारदपुराणे संकटनाशनम् गणपतिस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
Astabhyo brahmanebhyas ca likhitva yah samarpayet l
tasya vidya bhavet sarva Ganesasya prasadatah ll
ll Iti sri narada purane samkastanasana Ganesa stotram sampurnam ll
Vakratundaye Hum !!
Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् l
भक्तावासं स्मरेन्नित्यामायु: कामार्थ सिध्ध्ये ॥
Pranamya sirasa devan gauriputram vinayakam l
bhaktavasam smaren nityam ayus kamartha siddhaye ll
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् l
तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवकत्रं चतुर्थकम् ॥
Prathamam vakratundam ca ekadantam dvitiyakam l
trtiyam Krsna pingaksam gajavaktram caturthakam ll
लंबोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च l
सप्तमं विन्धराजं च धूम्रवर्ण तथाSष्टमम्।l
नवमम् भालचन्द्रम् दशमं तु विनायकम् l
ऐकादशं गणपति द्वादशं तु गजाननम् ॥
Lambodaram pancamam ca sastam vikatam eva ca l
saptamam vighnarajam ca dhumravarnam tathastamam ll
Navamam phalacandram ca dasamam tu vinayakam l
ekadasam ganapatim dvadasam tu gajananam ll
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर: l
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ॥
Dvadasaitani namani trisandhyam yah pathen narah l
na ca vighnabhayam tasya sarvasiddhi karam param ll
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् l
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥
Vidyarthi labhate vidyam dhanarthi labhate dhanam l
putrarthi labhate putran moksarthi Labhathe Gatheem ll
जपेद्द गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलम् लभते l
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय ॥
Japet Ganapati stotram sadbhir masaih phalam labhet l
samvatsarena siddhim ca labhate natra samsayah ll
अष्टानां ब्राह्मणानां च लिखित्वा य: समर्पयेत् l
तस्यविद्या भवेत्सर्वा गणेशस्यप्रसादत॥
॥ इतिश्री नारदपुराणे संकटनाशनम् गणपतिस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
Astabhyo brahmanebhyas ca likhitva yah samarpayet l
tasya vidya bhavet sarva Ganesasya prasadatah ll
ll Iti sri narada purane samkastanasana Ganesa stotram sampurnam ll
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Vijay Goel
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Monday, August 27, 2012
Swastik and its importance.
This article i got from Net from facebook status, i don't know the source :
स्वास्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ’स्वास्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल
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स्वास्तिक का महत्व
_________________स्वास्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ’स्वास्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल
’ करने वाला।
स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ (卐) कहते हैं। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ (卍) कहते हैं। जर्मनी के हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था।
स्वास्तिक को चित्र के रूप में भी बनाया जाता है और लिखा भी जाता है जैसे "स्वास्ति न इन्द्र:" आदि.
स्वास्तिक भारतीयों में चाहे वे वैदिक हो या सनातनी हो या जैनी ,ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ... शूद्र सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवाह आदि संस्कार घर के अन्दर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर "ऊँ" और स्वातिक का दोनो का अथवा एक एक का प्रयोग किया जाता है। हिन्दू समाज में किसी भी शुभ संस्कार में स्वास्तिक का अलग अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है, बच्चे का पहली बार जब मुंडन संस्कार किया जाता है तो स्वास्तिक को बुआ के द्वारा बच्चे के सिर पर हल्दी रोली मक्खन को मिलाकर बनाया जाता है, स्वास्तिक को सिर के ऊपर बनाने का अर्थ माना जाता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का योगात्मक रूप सिर पर हमेशा प्रभावी रहे, स्वास्तिक के अन्दर चारों भागों के अन्दर बिन्दु लगाने का मतलब होता है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे, चारों तरफ़ भटके नही, वृहद रूप में स्वास्तिक की भुजा का फ़ैलाव सम्बन्धित दिशा से सम्पूर्ण एनर्जी को एकत्रित करने के बाद बिन्दु की तरफ़ इकट्ठा करने से भी माना जाता है, स्वास्तिक का केन्द्र जहाँ चारों भुजायें एक साथ काटती है, उसे सिर के बिलकुल बीच में चुना जाता है, बीच का स्थान बच्चे के सिर में परखने के लिये जहाँ हड्डी विहीन हिस्सा होता है और एक तरह से ब्रह्मरंध के रूप में उम्र की प्राथमिक अवस्था में उपस्थित होता है और वयस्क होने पर वह हड्डी से ढक जाता है, के स्थान पर बनाया जाता है। स्वास्तिक संस्कृत भाषा का अव्यय पद है, पाणिनीय व्याकरण के अनुसार इसे वैयाकरण कौमुदी में ५४ वें क्रम पर अव्यय पदों में गिनाया गया है। यह स्वास्तिक पद ’सु’ उपसर्ग तथा ’अस्ति’ अव्यय (क्रम ६१) के संयोग से बना है, इसलिये ’सु+अस्ति=स्वास्ति’ इसमें ’इकोयणचि’ सूत्र से उकार के स्थान में वकार हुआ है। ’स्वास्ति’ में भी ’अस्ति’ को अव्यय माना गया है और ’स्वास्ति’ अव्यय पद का अर्थ ’कल्याण’ ’मंगल’ ’शुभ’ आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब स्वास्ति में ’क’ प्रत्यय का समावेश हो जाता है तो वह कारक का रूप धारण कर लेता है और उसे ’स्वास्तिक’ का नाम दे दिया जाता है। स्वास्तिक का निशान भारत के अलावा विश्व में अन्य देशों में भी प्रयोग में लाया जाता है, जर्मन देश में इसे राजकीय चिन्ह से शोभायमान किया गया है, अन्ग्रेजी के क्रास में भी स्वास्तिक का बदला हुआ रूप मिलता है, हिटलर का यह फ़ौज का निशान था, कहा जाता है कि वह इसे अपनी वर्दी पर दोनो तरफ़ बैज के रूप में प्रयोग करता था, लेकिन उसके अंत के समय भूल से बर्दी के बेज में उसे टेलर ने उल्टा लगा दिया था, जितना शुभ अर्थ सीधे स्वास्तिक का लगाया जाता है, उससे भी अधिक उल्टे स्वास्तिक का अनर्थ भी माना जाता है। स्वास्तिक की भुजाओं का प्रयोग अन्दर की तरफ़ गोलाई में लाने पर वह सौम्य माना जाता है, बाहर की तरफ़ नुकीले हथियार के रूप में करने पर वह रक्षक के रूप में माना जाता है।
काला स्वास्तिक श्मशानी शक्तियों को बस में करने के लिये किया जाता है, लाल स्वास्तिक का प्रयोग शरीर की सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा के प्रति भी माना जाता है, डाक्टरों ने भी स्वास्तिक का प्रयोग आदि काल से किया है, लेकिन वहां सौम्यता और दिशा निर्देश नही होता है। केवल धन (+) का निशान ही मिलता है। पीले रंग का स्वास्तिक धर्म के मामलों में और संस्कार के मामलों में किया जाता है, विभिन्न रंगों का प्रयोग विभिन्न कारणों के लिये किया जाता है।
स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ (卐) कहते हैं। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ (卍) कहते हैं। जर्मनी के हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था।
स्वास्तिक को चित्र के रूप में भी बनाया जाता है और लिखा भी जाता है जैसे "स्वास्ति न इन्द्र:" आदि.
स्वास्तिक भारतीयों में चाहे वे वैदिक हो या सनातनी हो या जैनी ,ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ... शूद्र सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवाह आदि संस्कार घर के अन्दर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर "ऊँ" और स्वातिक का दोनो का अथवा एक एक का प्रयोग किया जाता है। हिन्दू समाज में किसी भी शुभ संस्कार में स्वास्तिक का अलग अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है, बच्चे का पहली बार जब मुंडन संस्कार किया जाता है तो स्वास्तिक को बुआ के द्वारा बच्चे के सिर पर हल्दी रोली मक्खन को मिलाकर बनाया जाता है, स्वास्तिक को सिर के ऊपर बनाने का अर्थ माना जाता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का योगात्मक रूप सिर पर हमेशा प्रभावी रहे, स्वास्तिक के अन्दर चारों भागों के अन्दर बिन्दु लगाने का मतलब होता है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे, चारों तरफ़ भटके नही, वृहद रूप में स्वास्तिक की भुजा का फ़ैलाव सम्बन्धित दिशा से सम्पूर्ण एनर्जी को एकत्रित करने के बाद बिन्दु की तरफ़ इकट्ठा करने से भी माना जाता है, स्वास्तिक का केन्द्र जहाँ चारों भुजायें एक साथ काटती है, उसे सिर के बिलकुल बीच में चुना जाता है, बीच का स्थान बच्चे के सिर में परखने के लिये जहाँ हड्डी विहीन हिस्सा होता है और एक तरह से ब्रह्मरंध के रूप में उम्र की प्राथमिक अवस्था में उपस्थित होता है और वयस्क होने पर वह हड्डी से ढक जाता है, के स्थान पर बनाया जाता है। स्वास्तिक संस्कृत भाषा का अव्यय पद है, पाणिनीय व्याकरण के अनुसार इसे वैयाकरण कौमुदी में ५४ वें क्रम पर अव्यय पदों में गिनाया गया है। यह स्वास्तिक पद ’सु’ उपसर्ग तथा ’अस्ति’ अव्यय (क्रम ६१) के संयोग से बना है, इसलिये ’सु+अस्ति=स्वास्ति’ इसमें ’इकोयणचि’ सूत्र से उकार के स्थान में वकार हुआ है। ’स्वास्ति’ में भी ’अस्ति’ को अव्यय माना गया है और ’स्वास्ति’ अव्यय पद का अर्थ ’कल्याण’ ’मंगल’ ’शुभ’ आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब स्वास्ति में ’क’ प्रत्यय का समावेश हो जाता है तो वह कारक का रूप धारण कर लेता है और उसे ’स्वास्तिक’ का नाम दे दिया जाता है। स्वास्तिक का निशान भारत के अलावा विश्व में अन्य देशों में भी प्रयोग में लाया जाता है, जर्मन देश में इसे राजकीय चिन्ह से शोभायमान किया गया है, अन्ग्रेजी के क्रास में भी स्वास्तिक का बदला हुआ रूप मिलता है, हिटलर का यह फ़ौज का निशान था, कहा जाता है कि वह इसे अपनी वर्दी पर दोनो तरफ़ बैज के रूप में प्रयोग करता था, लेकिन उसके अंत के समय भूल से बर्दी के बेज में उसे टेलर ने उल्टा लगा दिया था, जितना शुभ अर्थ सीधे स्वास्तिक का लगाया जाता है, उससे भी अधिक उल्टे स्वास्तिक का अनर्थ भी माना जाता है। स्वास्तिक की भुजाओं का प्रयोग अन्दर की तरफ़ गोलाई में लाने पर वह सौम्य माना जाता है, बाहर की तरफ़ नुकीले हथियार के रूप में करने पर वह रक्षक के रूप में माना जाता है।
काला स्वास्तिक श्मशानी शक्तियों को बस में करने के लिये किया जाता है, लाल स्वास्तिक का प्रयोग शरीर की सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा के प्रति भी माना जाता है, डाक्टरों ने भी स्वास्तिक का प्रयोग आदि काल से किया है, लेकिन वहां सौम्यता और दिशा निर्देश नही होता है। केवल धन (+) का निशान ही मिलता है। पीले रंग का स्वास्तिक धर्म के मामलों में और संस्कार के मामलों में किया जाता है, विभिन्न रंगों का प्रयोग विभिन्न कारणों के लिये किया जाता है।
स्वास्तिक के चारो
और सर्वाधिक पॉजीटिव ऊर्जा पाई गई है दूसरे। अधिक पाजिटिव इनर्जी की वजह से
स्वास्तिक किसी भी तरह का वास्तुदोष तुरंत समाप्त कर देता है।
Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666
Monday, August 13, 2012
Improve the diet
Some health Tips :
Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666
Monday, August 6, 2012
Importance and how to do Parikrama or Pradakshina
We
circumambulate the murti or the ALTAR. This is called Pradakshina.
Don't run or walk fast while doing pradashina, do it as slow as possible
(similar to tortoise).
Thanking You,
Regards,
Vijay Goel
Astrologer and Vastu Counselor,
Mob : 92145 02239
email : goelvj@gmail.com
www.IndianAstroVedic.com
Thursday, August 2, 2012
Prayer of Exorcism
This is very helpful for those who go to Church regularly.
Holy Mother/Father God of Light, Divine Creator of All That Is, Through
the authority vested in me by the Cosmic Christ Consciousness
I deliberately call forth to the energy of Archangel Michael and the
Band of Mercy (a group of angels whose job it is to move lost souls out
of the astral plane) to enter the the body, home, automobile and place
of _____________________ to remove all negative influences and entities.
I ask that these energies and entities be taken to the Light for
transmutation and that there be no negative side effects physical,
mental or emotional to ___________________’s body. I ask that
_______________________’s body be triple sealed (it is helpful to think
of the person in three bubbles of light – purple, pink and white )
against any further return or invasion of negative forces. (you can tone
at this point). You do not have to have the person’s permission to do
exorcism, because possession is against spiritual law.
Use this EXACTLY how it is stated. DO NOT CHANGE any words.
-------------
Thanking You,
Use this EXACTLY how it is stated. DO NOT CHANGE any words.
-------------
Thanking You,
Regards,
Vijay Goel
Astrologer and Vastu Counselor,
Mob : 92145 02239
email : goelvj@gmail.com
www.IndianAstroVedic.com
Sunday, July 22, 2012
Wear Roots to satiate planets
ग्रह शांति के लिए जड़ी धारण करें
यदि मनुष्य परिस्थितिवश अमूल्य रत्न धारण न कर सकें तो ग्रहों से संबंधित
जड़ी धारण करना भी फलकारक होता है। विधि-विधान से धारण की गई जड़ी भी रत्न
के समान ही फलकारक होती है।
प्रत्येक ग्रह की जड़ी को रविवार को पुष्य
नक्षत्र में धारण करना चाहिए। जड़ी एक दिन पूर्व शनिवार को सायंकाल स्नान
करके शुद्ध वस्त्र धारण कर उस वृक्ष का विधिवत पूजन करके कार्य सिद्धि के
लिए उससे प्रार्थना करें व दूसरे दिन शुभ समय पर उसकी जड़ ले आए।
जड़ी को ग्रह के रंग के धागे में पिरोकर पुरुषों को दाहिनी भुजा में व स्त्रियों को बांयी भुजा में पहनना चाहिए।
ग्रह जड़ी
1. सूर्य विल्वमूल
2. चंद्र खिरनी मूल
3. मंगल अनंतमूल
4. बुध विधारा की जड़
5. शुक्र सिंहपुछ की जड़
6. शनि बिच्छोल की जड़
7. राहु खेत चंदन की जड़
8. केतु अश्वगंध की जड़
9. गुरु भारंगी/केले की जड़
विशेष : वृक्ष या पौधा न मिलने पर पंसारी से जड़ खरीदकर पूजा आदि के बाद
आस्था व विश्वास के साथ धारण करनी चाहिए। इष्ट देव व ग्रह स्वामी का ध्यान
करके व ग्रह के मंत्र का जाप करके जड़ी धारण करने से कार्यसिद्धि अवश्य
होती है।
Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666
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