Wednesday, April 27, 2011

Pitar Dosha and its remedies. पितृदोष और उसके उपाय.


मै यहां पर पितृदोष को दूर करने का एक बढिया उपाय बता रहा हूँ,यह एक बार की ही पूजा है,और यह पूजा किसी भी प्रकार के पितृदोष को दूर करती है। 

सोमवती अमावस्या को (जिस अमावस्या को सोमवार हो) पास के पीपल के पेड के पास जाइये,उस पीपल के पेड को एक जनेऊ दीजिये और एक जनेऊ भगवान विष्णु के नाम का उसी पीपल को दीजिये,पीपल के पेड की और भगवान विष्णु की प्रार्थना कीजिये,और एक सौ आठ परिक्रमा उस पीपल के पेड की दीजिये,हर परिक्रमा के बाद एक मिठाई जो भी आपके स्वच्छ रूप से हो पीपल को अर्पित कीजिये। परिक्रमा करते वक्त : "ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते जाइये। परिक्रमा पूरी करने के बाद फ़िर से पीपल के पेड और भगवान विष्णु के लिये प्रार्थना कीजिये और जो भी जाने अन्जाने में अपराध हुये है उनके लिये क्षमा मांगिये। सोमवती अमावस्या की पूजा से बहुत जल्दी ही उत्तम फ़लों की प्राप्ति होने लगती है।

आगे आने वाली सोमवती अमावस्यायें


29th August 2011
23rd Jan. 2012
15th October 2012
11th March 2013.
8th July 2013
2nd December 2013
25th August 2014
22nd December 2014


एक और उपाय है (2) कौओं और मछलियों को चावल और घी मिलाकर बनाये गये लड्डू हर शनिवार को दीजिये।

Remedy 1: 
On any somwati amavaasya (when there is Amaavasyaa and also monday) go to peepal tree,offer one janeu to tree and one to Lord Vishnu.Pray to tree and Lord Vishnu.Then do 108 Parikrama of tree,with each Parikrama offer a sweet to tree.While doing Parikrama continuously chant the mantra " OM NAMO BHAGAWATE  VAASUDEWAAYA".After doing parikrama again pray to peepal tree and Lord Vishnu and seek forgiveness.

Remedy 2: One more remedy is to feed crows and fish with rice mixed with gee and made into balls on every Saturday.

Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666

Saturday, April 9, 2011

Religious importance of Five. [पञ्च का धार्मिक महत्व ]

पंचदेव : सूर्य, गणेश , शिव , शक्ति और विष्णु ये पंचदेव कहलाते है. सूर्य को दो परिक्रमा, गणेश को एक, शक्ति को तीन, विष्णु की चार तथा शिव की आधी परिक्रमा की जाती है.

पंच उपचार पूजा : गंध, पुष्प, धुप, दीप, और नैवेध अर्पित करना पञ्च उपचार पूजा कहलाती है.

पंच  पल्लव : पीपल, गुलर, अशोक, आम और वट के पत्ते सामूहिक रूप से पंच पल्लव के नाम से जाने जाते है.

पंच पुष्प : चमेली, आम, शमी (खेजड़ा), पदम (कमाल) और कनेर के पुष्प सामूहिक रूप से पंच पुष्प के नाम से जाने जाते है.

पंच गव्य : भूरी गाय का मूत्र (८ भाग), लाल गाय का गोबर (१६ भाग ), सफ़ेद गाय का दूध (१२ भाग), काली गाय का दही (१० भाग), नीली गाय का घी (८ भाग ) का मिश्रण पंच गव्य के नाम से जाना जाता है.

पंच  गंध : चूर्ण किया हुआ, घिसा हुआ, दाह से खीचा हुआ, रस से मथा हुआ, प्राणी के अंग से पैदा हुआ , ये पंच गंध है.

पंचामृत : दूध, दही, घी, चीनी, शहद का मिश्रण पंचामृत है.

पंच मेवा : काजू, बादाम, किसमिस , छुआरा, खोपरागित (नारियल का खोपरा ), पंच मेवा है.

पंचांग : तिथि, वार, नक्षत्र, करण, और योग को सम्मिलित रूप से दर्शाया जाने वाली तालिका को पंचांग कहते है.

अगर  हम ज्योतिष से हिसाब से सोचे तो सूर्य, चन्द्रे , राहू, केतु को छोड़ दे तो केवल पांच स्थूल ग्रह बचते है :
बुध, मंगल, शुक्र, बृहस्पति और शनि, यह पंच ग्रह है, इसी प्रकार पंच तत्त्व [आकाश, वायु, जल, अग्नि, भूमि ], भी ऊपर के पंच को सम्भोधित करते है.

Regards,
Vijay Goel
Jyotish Visharad.
vedic astrologer and vaastu consultant.
www.IndianAstroVedic.com
www.LalKitabSpeaks.com 

Friday, March 11, 2011

विशेष उपाय : More General Remedies.

उपाय विशेष :
  1. घर में सुख-शान्ति न हो तो पीपल पर सरसों के तेल का दीया जलाना और जला कर काले माह (उड़द ) के तीन दाने दीये में डालना चाहिए, ऐसा तीन शनिवार शाम को करें।
  2. दुर्घटना या सर्जरी का भय हो तो तांबें के बर्तन में गुड़ हनुमान जी के मन्दिर में देने से बचाव होता है और अगर सरसों के तेल का दीया वहीं जलाये और वहीं बैठ कर हनुमान चालीसा पढ़े और हलवा चढाये तो काफ़ी बचाव होता है, ऐसा चार मंगलवार रात्रि करें।
  3. बहन भाईओं से कोई समस्या हो तो सवा किलो गुड़ जमीन में दबाने से समझौता होता है, ऐसा मंगलवार को करें।
  4. बच्चों की पढ़ाई के लिए सवा मीटर पीले कपडें में २ किलो चने की दाल बांधकर लक्ष्मी-नारायण जी के मन्दिर में चढाये, ऐसा पाँच शाम वीरवार को करें।
  5. कमर, गर्दन में तकलीफ रहती हो तो दोनों पैरों के अंगूठे में काला सफ़ेद धागा बांधें।
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant.
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Sunday, January 30, 2011

Lal Kitab Remedies

This article is taken from Sri lal Kitab Amrit wale Vashisthji.

Q.1 
   नौकरी बार बार छूट जाती है ?
Ans :- 10 साधुओं को हर साल खाना खिलाए पर उनको पैसे ना दें, 43 दिन तक गेंहू और गुड़ मिला कर उनके लड्डू बनाए और स्कूल के बच्चो को बाँटे, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे लगाए, 43 दिन तक तीन केले मंदिर मे दान दें
     Q.2 बहुत इंटरव्यू दिए पर पास नही हो पाता, कोई ना कोई बात रह जाती है ?
Ans:- 43 दिन दो मुट्ठी सौंफ सरकारी संस्थान मे दान दें, 43 दिन पतीसा पिता को खिलाएँ, पिता को 7 रत्ती का मूँगा सोने मे डाल कर पहनाए
Q.3 सरकार के द्वारा परेशानी रहती है ?
Q.4 सरकारी कामो मे हाथ डालता हूँ, पर काम नही बनता ?
Ans:- राहु की वस्तु से परहेज करें जैसे काले नीले रंग से, आदित्या ह्रदय स्तोत्र का पाठ करें, बंदरो को गुड़ खिलाते रहे,  मंदिर से पैसा उठा कर लाल कपड़े मे बाँध कर जेब मे रखे (तांबे का पैसा हो तो सही), हर सूर्या ग्रहण मे 4 नारियल 400 ग्राम साबुत बादाम जल प्रवाह करें, इन लोगो की पिता से नही बनती या इनके पिता किसी काबिल नही होते है |
Q. 5 घर मे रोज झगड़ा होता रहता है ?
Ans:- 43 दिन सिरहाने पानी रख कर कीकर के पेड़ मे डाले,  43 दिन 3 केले मंदिर मे दें, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल और चाँदी का चकोर टुकड़ा डाल कर रखे, विद्वान या माता के पावं मे हाथ लगाकर आशीर्वाद ले, घर के उत्तर पूर्व कोने से संदूक, ट्रंक या किसी भी प्रकार की गंदगी हो तो हटा दे.
Q. 6 जो काम करता हूँ, पूरा नही होता ?
Ans:- 43 दिन  गाय के घी का दीपक मंदिर मे जलाएँ, ज़मीन मे पैदा हुई सब्जी धार्मिक स्थान मे दे.
 
Q.7 मुझे रात को नींद नही आती है ? 
Ans :- 2 किलो सौंफ सूती लाल कपड़े मे बाँध कर सोने वाले कमरे मे रखे,  2 किलो देसी खंड, लाल कपड़े मे बाँध रखें,   हर रोज सिरहाने पानी रख कर सोए, और रोज किसी बड़े पेड़ मे डाल दे पिए नही, पूरब और उत्तर की तरफ सर रख कर ना सोए, 48 दिन 3 केले मंदिर मे दे, कुत्तो की सेवा करें, और  कमर पावं मे दर्द हो तो उल्टे हाथ मे सोना शुरू करें.
Q. 8 उदास रहता हूँ ?
Ans :-  हरे और नीले रंग से परहेज रखे, बुध और राहु की वस्तुएँ घर से निकालें, बुध राहु मार्तंड यंत्र गले मे डाले, 6 दिन के लिए नाक छेदन करवाएँ, सोना या चाँदी की तार या सफेद धागा नाक मे पहने, 6 दिन 6 कन्याओं को 6-6 साबुत बादाम दें.
Q.9  हमेशा डर लगा रहता है ?
 Ans:- सोने वाले तकिये मे लाल रंग की फिटकरी रखे, 43 दिन नारियल बादाम मंदिर मे रखे या जल प्रवाह करे, जल्दी से कान छेदन करवा कर सोना धारण करें.
Q10 . मरने का डर लगता है ?
Ans :- 96 दिन के लिए नाक छेदन करवा कर चाँदी धारण करे, 43 दिन खाली मटका जल प्रवाह करें, लोहे का छल्ला बीच वाली उंगली मे धारण करे और तांबे के छेड़ वाला पैसा गले मे पहने.
 Q.11 पढ़ाई मे मन नही लगता है ?
Ans :-  43 दिन 500 ग्राम दूध मंदिर मे दें, सूर्या अस्त के बाद दूध और चावल का इस्तेमाल ना करे, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल रखे, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे करे, 43 दिन बड़ के पेड़ पर दूध चड़ा कर गीली मिट्टी का तिलक करे, हर गुरुवार और सोमवार को सफेद घोड़े या पीले घोड़े को चने की दाल  खिलाएँ.
Q.12 किसी काम मे मन नही लगता है ?
Ans :-  43 दिन 500 ग्राम दूध मंदिर मे दें, सूर्य अस्त के बाद दूध और चावल का इस्तेमाल ना करे, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल करें, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे करे, 43 दिन बड़ के पेड़ पर दूध चड़ा कर गीली मिट्टी का तिलक करे, हर गुरुवार और सोमवार को सफेद घोड़े या पीले घोड़े को चने की दाल  खिलाए.
Q.13 सब से अधिक अपने आपको ग़रीब बेसहारा समझता हूँ ?
Ans :- हर सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण पर 4 नारियल और 400 ग्राम साबुत बादाम जल प्रवाह करें, घर के उत्तर पूर्व मे पानी का कुंभ लगाएँ, चाँदी तन मे धारण करें, हर शुक्रवार अपने वजन के बराबर हरा चारा गाए को खिलाए, हर रोज इत्र का इस्तेमाल करें, हर रोज नहा कर साफ़ कपड़े प्रेस किए हुए पहने, हर रोज उगते हुए सूरज के सामने खड़े हों.
Q.14 कुछ ऑपर्चुनिटी मिलती है, पर डर के कारण उसको ले नही पाता?
Ans :- अंडर गारमेंट मे पीले रंग के कपड़ो का इस्तेमाल करें, पीले कपड़ो मे 9 लाल मिर्च बांद कर घर में कील पर टाँगे, 43 दिन फिटकरी से दाँत सॉफ करन.

Regards,
Vijay Goel
Vedic astrologer & Vastu consultant.
www.IndianastroVedic.com 

Saturday, January 29, 2011

Spiritual Remedies for Marriages.

Spiritual Remedies for Marriages.

We give hereunder some of the ancient mantras for the benefit of the readers whose marriage get delayed due to various reasons. With the blessings of Goddess Durga Devi, I give some mantras which should be recited with utmost devotion and faith to get their wish fulfilled.

KATYAYANI MANTRA
‘Katyayani Mahamaye
Mahayoginiyadheeshwari
Nand Gop Sutam Devi Patim Me
Kuru te Namah’
This prayer should be recited a number of times according to one’s convenience by unmarried girls whose wishes will be fulfilled early.

PARVATI SWAYAMVAR MANTRA
‘Ballarkayutsatprabhaam kartale
lolbru malakulam
Malamsanddahatim manohartanum
Mandsmitadhomukheem
Mandam mandmupesushee
Bariyitum shambhum jaganmohimim
Vanditpadamishtarthadaam
Parvateem’

This sloka should be recited every Friday evening regularly with utmost devotion. The natives get the desired husband early.

VIVAH SIDDHIDAYAKA MANTRA
‘ Om vahri presyasi swaha’
This mantra should be recited ten thousand times and should be started on an auspicious day without Durmuhurtam or Varjam and should be continued till Navaratri.


SWAYAMVARKALA MANTRA
‘Om hreem yogini yogini yogeshwari
yogeshwari yog bhayankari
Sakalsthavarjangmasya mukham
Hradyam mum ashmakarshayakarshaya
Swaha’

This mantra should be recited ten thousand times and should be started on an auscipicious day without Durmuhurtam or Varjam.

BHAGVATI MANTRA
‘Haristvamaradhya pranatjana
saubhagya jannim Pura nari
bhootwa pur ripumpi
Kshobhmanayt Samroapi twam
Natwa ratinayanlehyen vapusha
Muninamapyantah prabhavati hi
Mohay mahataam’
 
PARVATI MANTRA
‘Sudhamapyaswadya pratibhaya jara
mrituharini
vidhishatamkhadya divishadah
Karlam yatkshvelam kavalitvatah
Kaalkalana
Na shambhostanmoolam tav janani
Tatakmahima’

 
VED MANTRAS
‘Sa devi nityam paritapyamanah
twameva seetetyabhibhaashanah
Dradhvrato rajsuto mahatma tavalva
Laabhaya kratpraytnah’ 

PRITHVI MANTRA
‘mahamaha Indro ya ojasa parjanyo
vrashtim tamarind iv
upayaamgraheetosi
mahendrayatwesh tey
yonimmahindraya twa’

 
AMBA MANTRA
‘Om Ambe Ambike Ambalike na
Manayati Kashchana
Sasatyashwakah Subhadrikam
Kampeelvasinim’

For Male Natives

Durga mantra
‘Patneem Manoramaam Dehi
Manovratanusarineem
Tarineem Durg Sansara Sangarasya
Kulodbhavaam 

SUCHI DEVI MANTRA
‘ Om devendirani Namstubhyam
Devendra Priya Bhamini
Vivaham Bhagyamarogyam
Sheeghram labham cha Dehi me’ 

 VIJAYA SUNDARI MANTRA
‘Om Vijayasundari kleem’

Mantra for Sreegrha (Fast) Marriages and to avoid delays in Marriage

"Om Devemdrani Namastubyam
Devendra priyabhamini
Vivaha Bhagyam Arogyam
Sreeghra labhincha Dehime"
The unmarried girls and boys whose marriage proposals are being get delayed due to various reasons are advised to recite the above mantra with utmost faith at recite the same at least 21 times daily or 108 times daily to fulfill their desire. This mantra is also useful for those who want to go for second marriage may be benefited.
Especially, on Tuesdays, this mantra should be recited at least 108 times for 41 days regularly and feed red grams with jaggary to the cow as food will give faster results.

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Thank you
Best Wishes,
Vijay Goel
Vedic Astrologer and Vastu Consultant,
Cell : +91 8003004666

For Happy Marriage life : Mangala Gouri Vrat

Mangala Gauri Puja or Mangal Gowri Vrata is observed on Shravan Mangalvars (Tuesdays during Shravan month). 
Mangala Gauri Vrat is dedicated to Goddess Mangala Gauri, who is popularly known as Goddess Parvati Devi.
The Mangla Gari Vrat is observed on every Tuesday of the month of Shravan, around July-August. As Mondays of this month are the day for worship of Lord Shiva. The Tuesday of this month are the adoration of Mangla Gauri (one of the nine Durga Shobshi). This Fast is only observed by women. Mainly this is done for 16 or 20 Tuesdays. This vrat is dedicated to Goddess Parvati.
Mangala Gouri Vrat is observed by married women for the good health and long life of the husband. They will be blessed with wealth and good children.
Mangala Gauri Vratam is observed by married women for first five years after their marriage and the final year puja is concluded with Shravana Mangala Gouri Vrata Udhyapana.

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Shri Gauri Astottara Satanamavali or 108 names of Mangala Gowri is the stotram to recite during Gauri Puja, especially on Mangala Gauri Puja, Maha Gouri Puja or Shodasa Gauri Puja.


Devotees recite Gouri Astottaram on every Friday.

Om Murari priyardhamgyai namah 
Om Putra poutra varapradayai namah
Om Punyayai namah
Om Krupa prurnayai namah
Om Kalyanyai namah
Om Anchit yayai namah
Om Tripurayai namah
Om Trigunam bikayai namah
Om Purushardha pradayai namah
Om Satya dharma ratayai namah
Om Sarva sakshinyai namah
Om Shashamka rupinyai namah
Om Sarasvatyai namah
Om Virajayai namah
Om Svahayai namah
Om Svadhayai namah
Om Pratyamgi rambikayai namah
Om Aaryayai namah
Om Dakshaenyai namah
Om Deekshayai namah
Om Sarvottamotta mayai namah
Om Shivabhinama deyayai namah
Om Sreevidyayai namah
Om Pranavardha svarupinyai namah
Om Hrinkaryai namah
Om Naada rupayai namah
Om Sundaryai namah
Om Shodashakshara devatayai namah
Om Mahagouryai namah
Om Shyamalayai namah
Om Chandyai namah
Om Bhaga malinyai namah
Om Bhagalayai namah
Om Matrukayai namah
Om Shulinyai namah
Om Amalayai namah
Om Annapurnayai namah
Om Akhilagama samstut yayai namah
Om Ambayai namah
Om Bhanukoti sandyatayai namah
Om Parayai namah
Om Seetamshu kruta shekha rayai namah
Om Sarvakala sumangalyai namah
Om Soma shekharyai namah
Om Amara samsev yayai namah
Om Amrutai shvaryai namah
Om Sukha sachi chudara sayai namah
Om Balyaradita bhutidayai namah
Om Hiranyayai namah
Om Sukshmayai namah
Om Haridra kumkuma radhyayai namah
Om Sarvabhoga pradayai namah
Om Markandeya varapradayai namah
Om Sree nityagouree devatayai namah 
//108//
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Vijay Goel
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Friday, January 28, 2011

कामाख्या स्तुति पीठ - स्थान - वर्णनम् : Kamakhya Stuti : Part 13,

कामाख्या - पीठ - स्थान - वर्णनम्
नेपालं च महा - पीठं, पौगण्ड - वर्द्धमानाथ ।
पुर - स्थिरं महा - पीठं, चर - स्थिरमतः परम् ॥१॥
काश्मीरं च तथा पीठं, कान्यकुब्जमथ भवेत् ।
दारुकेशं महा - पीठमेकाम्रं च तथा शिवे ! ॥२॥
त्रिस्रोत - पीठमुद्दिष्टं, काम - कोटमतः परम् ।
कैलासं भृगु - नगं च, केदारं पीठमुत्तमम् ॥३॥
श्री - पीठं च तथोङ्कारं, जालन्धरमतः परम् ।
मालवं च कुलाब्जं च, देव - मातृकामेव च ॥४॥
गोकर्णं च तथा पीठं, मारुतेश्वरमेव च ।
अष्टहासं च वीरजं, राज - गृहमतः परम् ॥५॥
पीठं कोल - गिरिश्चैव, एला - पुरमतः परम् ।
कालेश्वरं महा - पीठं, प्रणवं च जयन्तिका ॥६॥
पीठमुज्जयिनीं चैव, क्षीरिका - पीठमेव च ।
हस्तिनापूरकं पीठं, पीठमुड्डीशमेव च ॥७॥
प्रयागं च हि षष्ठीशं, मायापुरं कुलेश्वरी ।
मलयं च महा - पीठं, श्रीशैलं च तथा प्रिये ! ॥८॥
मेरु - गिरिं महेन्द्रं च, वामनं च महेश्वरि ! ।
हिरण्य - पूरकं पीठं, महा - लक्ष्मी - पुरं तथा ॥९॥
उड्डीयानं महा - पीठं, काशी - पुरमतः परम् ।
पीठान्येतानि देवेशि ! अनन्त - फल - दायिनी ॥१०॥
यत्रास्ति कालिका - मूर्तिर्निर्जन - स्थान - कानने ।
विल्व - वनादि - कान्तारे, तत्रास्थायाष्टमी - दिने ॥११॥
कृष्ण - पक्षे चतुर्दश्यां, शनि - भौम - दिब्ने तथा ।
महा - निशाया देवेशि ! तत्र सिद्धिरनुत्तमा ॥१२॥
अन्यान्यपि च पीठान्ति, तत्र सन्ति न संशयः ।
देव - दानव - गन्धर्वाः, किन्नराः प्रमथादयः ॥१३॥
यक्षाद्या नायिका सर्वा, किन्नर्यश्च देवाङ्गनाः ।
अचर्यन्त्यत्र देवेशीं, पञ्चतत्त्वादिभिः पराम् ॥१४॥
वाराणस्यां सदा पूज्या, शीघ्रं तु फलदायिनी ।
ततस्तु द्विगुणा प्रोक्ता, पुरुषोत्तम - सन्निधो ॥१५॥
ततो हि द्विगुणा प्रोक्ता, द्वारावत्यां विशेषतः ।
नास्ति क्षेत्रेषु तीर्थेषु, पूजा द्वारावती - समा ॥१६॥
विन्ध्येऽपि षडगुणाप्रोक्ता, गङ्गायामपि तत् - समा ।
आर्यावर्ते मध्य - देशे, ब्रह्मावर्ते तथैव च ॥१७॥
विध्यवत् फलदा प्रोक्ता, प्रयागे पुष्करे तथा ।
एतच्च द्विगुणोक्तं प्रोक्तं, करतोया - नदी - जले ॥१८॥
ततश्चतुर्गुणं प्रोक्तं, नन्दी - कुण्डे च भैरवे ।
एतच्चतुर्गुणं प्रोक्तं वल्मीकेश्वर - सन्निधौ ॥१९॥
यत्र सिद्धेश्वरी योनौ, ततोऽपि द्विगुणा स्मृता ।
ततश्चतुर्गुणा प्रोक्ता लौहित्य - नद - पयसि ॥२०॥
तत् - समा काम - रुपे, सर्वत्रैव जले स्थले ।
देवी - पूजा तथा शस्ता, काम - रुपे सुरालये ॥२१॥
देवी - क्षेत्रे काम - रुपं, विद्यते नहि तत् - समम् ।
सर्वत्र विद्यते देवी, काम - रुपे गृहे गृहे ॥२२॥
ततश्चतुर्गुणं प्रोक्तं, कामाख्या - योनि - मण्डलम् ।
कामाक्यायां महा - माया, सदा तिष्ठति निश्चितम् ॥२३॥
एषु स्थानेषु देवेशि ! यदि दैवात् गतिर्भवेत् ।
जप - पूजादिकं कृत्वा, नत्वा गच्छेत् यथा - सुखम् ॥२४॥
स्त्री - समीपे कृपा पूजा, जपश्चैव वरानने ! ।
काम - रुपाच्छत - गुणं, फलं हि समुदीरितम् ॥२५॥
अतएव महेशानि ! संहतिर्योषितां प्रिये ! ।
गृहीत्वा रक्त - वसनां, दुष्टां तु वर्जेत् भक्तिमान् ॥२६॥
एक - नित्यादि - पीठे वा, श्मशने वर - वर्णिनी ! ।
स्त्री - रुपे हि सदा सन्ति, पीठेऽन्यत्रापि चा प्रिये ! ॥२७॥
स्त्रयङ्गेषु च महामाया, जागर्ति सततं शिवे ! ।
देह - पीठं, प्रत्यक्षं दिव्य - रुपिणी ॥२८॥
भ्रान्त्याऽन्यत्र भ्रमन्ति ये, देशे देशे च मानवः ।
पशवस्ते .............. यथानघे ! ॥२९॥
काली - मूर्तिर्यत्र निर्जने, विपिने कान्तारे वापि ।
कृष्णाऽष्टमी - निशा - भागे, कालीं सम्पूज्य पञ्चमे ॥३०॥
गुटिका - खङ्ग - सिद्धिं च, खेचरी - सिद्धिमेव च ।
यक्ष - गन्धर्व - नागानां, नायिकानां महेश्वरी ! ॥३१॥
भूत - वेताल - देवानां, कन्यानां सिद्धिमेव च ।
जायते परमेशानि ! किं पुनः कथयामि ते ! ॥३२॥
पञ्चतत्त्व - विहीनानां, सर्वं निष्फलतां व्रजेत् ॥३३॥
॥ कामाख्या - तन्त्रे शिव पार्वती - सम्वादे एकादशः पटलः ॥
Translation - भाषांतर

हे देवेशि ! अनन्त फल देनेवाले महापीठ ये हैं - १. नेपाल, २. पौगण्ड, ३. वर्द्धमान, ४. पुर - स्थिर, ५. चर - स्थिर, ६. काश्मीर, ७. कान्यकुब्ज, ८. दारुकेश और ९ एकाम्र । इनके बार अत्यन्त उत्कृष्ट पीठ हैं - १. त्रि - स्रोत ( त्रिवेणी - संगम ), २. कामकोट, ३. कैलाश पर्वत, ४. भृगु पर्वत और ५. केदार । अन्य पीठ ये हैं - १. ॐ कार, २. जालन्धर, ३. मालव, ४. कुलाब्ज, ५. देव - मातृका, ६. गोकर्ण, ७. मारुतेश्वर, ८. अष्टहास, ९. वीरज, १०. राजगृह । पुनः महापीठ ये हैं - १. कोलगिरि, २. एलापुर, ३. कोलेश्वर प्रणव और ४. जयन्तिका । इनके अतिरिक्त पीठ ये हैं - १. उज्जयिनी, २. क्षीरिका, ३. हस्तिनापुर और ४. उड्डीश । पुनः महापीठ ये है - १. प्रयाग, २. षष्ठीश, ३. मायापुर, ४. कुलेश्वरी ( जनेश्वरी ), ५. मलय पर्वत, ६. श्रीशैल पर्वत, ७. मेरु पर्वत, ८. महेन्द्र पर्वत, ९. वामन पर्वत, १०. हिरण्यपुर, ११. महालक्ष्मीपुर और १२. उड्डीयान । इन सभी पीठस्थानों में साधना अनन्त फल देती हैं ।
हे देवेशि ! यदि किसी निर्जन स्थान में, वन के बीच या किसी बिल्वादिवन में या किसी दुर्गम घने वन के बीच काली की कोई मूर्ति हो, तो ऐसे किसी स्थान में बैठकर शनिवार या मंगलवारयुक्त कृष्णाऽष्टमी या कृष्णा चतुर्दशी तिथि में महानिशाकाल में कालिका देवी की साधना करने से अति उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है ।
अन्य भी पीठ संसार में हैं, इसमें सन्देह नहीं । वहाँ देव - दानव - गन्धर्व, किन्नर, प्रमथ, यक्ष, सभी नायिकाएँ, किन्नरियाँ और देव - स्त्रियाँ पंचतत्त्वों आदि से परा देवी की पूजा करती हैं ।
वाराणसी में देवी कामाख्या सदा पूजनीया हैं, शीघ्र ही फल देती हैं । उससे दूना फल पुरुषोत्तम तीर्थ में मिलता है । विशेष कर द्वारावती में उससे भी दूना फल मिलता है । द्वारावती के समान फलदायिनी पूजा अन्य किसी क्षेत्र, तीर्थ में नहीं होती ।
विन्ध्याचल और गंगा किनारे पूजा करने से छः गुना फल होता है और आर्यावर्त, मध्य - देश एवं ब्रह्मावर्त में भी वैसा ही फल मिलता है । प्रयाग और पुष्कर विन्ध्याचल के समान ही फलप्रद हैं । करतोया नदी के जल - मध्य में उसका दूना फल मिलता है ।
नदी - कुण्ड और भैरव - कुण्ड में पूजा का चौगुना फल होता है । उससे चौगुना फल वल्मीकेश्वर के निकट मिलता है । जहाँ सिद्धेश्वरी योनि विद्यमान है, वहाँ दुगुना फल होता है । उससे चौगुना फल लोहित नद के जल में बताया गया है ।
काम - रुप में जल और स्थल सभी स्थानों में की गई पूजा का फल वैसा ही होता है । काम - रुप और देवालय में महाशक्ति की पूजा प्रशस्त है । देवी - क्षेत्र में काम - रुप विद्यमान रहता है९, उसके समान कुछ भी नहीं है । इस प्रकार देवी काम - रुप में घर - घर में विराजमाना हैं ।
कामाख्या - योनि - मण्डल चौगुना फलदायक है । कामाख्या में महामाया सदैव निश्चित रुप से विद्यमान रहती हैं ।
हे देवेशि ! उक्त स्थान में यदि दैवयोग से पहुँच जाए, तो जप - पूजा आदि करके देवी को प्रणाम कर सहर्ष अभीष्ट स्थान को जाना चाहिए ।
हे वरानने ! स्त्री के पास की गई पूजा और जप का फल ' काम - रुप ' के प्रभाव से सौ गुना अधिक होता है । अतः हे महेशानि ! रक्तवस्त्रा स्त्रियों का सहयोग लेना चाहिए । दुष्ट स्वभाववाली स्त्रियों से भक्त साधकों को दूर रहना चाहिए ।
हे प्रिय सुन्दरी ! एक नित्या आदि पीठ में या श्मशान में या अन्य पीठों में भी स्त्री - रुप में देवी सदैव विराजमान रहती हैं । हे शिवे ! स्त्री के अंगों में महामाया निरन्तर जाग्रत रहती हैं । देहपीठ ही महापीठ है, वहाँ देवीरुप प्रत्यक्ष दिखाई देता है ।
भ्रान्तिवश जो मनुष्य देश - देश में भटकते फिरते हैं, हे पवित्रे ! वे पशु के समान ही हैं ।
निर्जन स्थान में, वन या घने जंगल में, जहाँ भी काली की मूर्ति स्थापित हो, वहाँ कृष्णाऽष्टमी के रात्रिकाल में पंचतत्त्वों से काली की पूजा करें, तो गुटिका - सिद्धि, खेचरी - सिद्धि, यक्ष - गन्धर्व - नाग - भूत - वेताल - देवों की नायिकाओं और कन्याओं की सिद्धि प्राप्त होती है । हे परमेश्वरी ! इससे अधिक क्या कहूँ । हाँ, पंचतत्त्वों से विहीन लोगों के सभी कर्म निष्फल होते हैं ।
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